वरिष्ठ स्तर पर महिलाओं की नियुक्ति लैंगिक रूढ़ियों को बदल सकती है: जस्टिस नागरत्ना

 


शीर्ष अदालत के नौ नवनियुक्त न्यायाधीशों के अभिनंदन के लिए आयोजित एक समारोह में सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बीवी नागरत्ना ने कहा कि महिला न्यायाधीशों की अधिक संख्या महिलाओं की न्याय मांगने और अपने अधिकारों को लागू करने की इच्छा को बढ़ा सकती है. कार्यक्रम में भारत के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने महिला वकीलों से आह्वान किया कि वे न्यायपालिका में 50 प्रतिशत आरक्षण के लिए ज़ोरदार तरीके से मांग उठाएं.

New Delhi: A view of the Supreme Court, in New Delhi, on Thursday. (PTI Photo / Vijay Verma)(PTI5_17_2018_000040B)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बीवी नागरत्ना ने रविवार को कहा कि न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने से व्यापक तरीकों से लैंगिक समानता की भूमिका को बढ़ावा मिलता है.


 उन्होंने कहा कि विशेष रूप से न्यायिक क्षेत्र में वरिष्ठ स्तर पर महिलाओं की नियुक्तियां लैंगिक रूढ़ियों को बदल सकती हैं, जिससे पुरुषों और महिलाओं की उचित भूमिकाओं के प्रति दृष्टिकोण और धारणा में बदलाव होगा.

जस्टिस नागरत्ना 2027 में भारत की पहली महिला प्रधान न्यायाधीश बन सकती हैं.उन्होंने कहा, ‘न्यायिक अधिकारियों के रूप में महिलाओं की भागीदारी, सरकार की विधायी और कार्यकारी शाखाओं जैसे अन्य निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाओं के अधिक प्रतिनिधित्व का मार्ग प्रशस्त कर सकती है.’

जस्टिस नागरत्ना सुप्रीम कोर्ट की महिला अधिवक्ताओं द्वारा शीर्ष अदालत के नौ नवनियुक्त न्यायाधीशों के अभिनंदन के लिए आयोजित एक समारोह में बोल रही थीं, जिसमें तीन महिला न्यायाधीश भी शामिल हैं.

उन्होंने कहा, ‘मैं कहना चाहूंगी, भारत के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने रास्ता दिखाया है कि क्यों अन्य शाखाओं चाहे वह विधायिका हो या कार्यपालिका की शाखाओं में महिलाएं अदृश्य अवरोधकों नहीं तोड़ सकतीं.’

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘मैं विस्तार से नहीं बोल सकती लेकिन इतना कह सकती हूं कि न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने से व्यापक तरीकों से लैंगिक समानता की भूमिका को बढ़ावा मिलता है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘विशेष रूप से न्यायिक क्षेत्र में वरिष्ठ स्तरों पर महिलाओं की नियुक्तियां लैंगिक रूढ़ियों को बदल सकती हैं जिससे पुरुषों और महिलाओं की उचित भूमिकाओं के प्रति दृष्टिकोण और धारणा में बदलाव होगा.’

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, शीर्ष अदालत में एक साथ नौ न्यायाधीशों की नियुक्ति को यादगार उपलब्धि बताते हुए उन्होंने कहा, ‘महिला न्यायाधीशों की अधिक संख्या और अधिक दृश्यता महिलाओं की न्याय मांगने और अपने अधिकारों को लागू करने की इच्छा को बढ़ा सकती है.’

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सिर्फ तत्काल नियुक्ति नहीं होनी चाहिए और यह जारी रहनी चाहिए, क्योंकि हम महिला सदस्य पूरे भारत से प्रतिभाओं की तलाश करेंगी ताकि वे न केवल संबंधित उच्च न्यायालयों में बल्कि सर्वोच्च न्यायालय में भी पदोन्नत हों.

युवा महिला अधिवक्ताओं को सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी उन्हें सलाह है कि वे कानून की सभी माध्यमों में खुद को शामिल करें और लगातार बेहतर करने का प्रयास करें.

उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है समय आ गया है कि परंपरागत रूढ़ियों को तोड़ दिया जाए और महिलाओं को आगे बढ़ने का प्रयास किया जाए.’

जस्टिस नागरत्ना के साथ नियुक्त शीर्ष अदालत की एक अन्य न्यायाधीश जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी ने कहा कि हाल में गुजरात में एक समारोह में उन्होंने कहा था कि जब न्यायाधीश मंच पर होते हैं तो उनका कोई लिंग नहीं होता.

जस्टिस त्रिवेदी ने कहा, ‘लेकिन मेरे मन में विशेष रूप से कामकाजी महिलाओं के लिए सॉफ्ट कॉर्नर है.’

जस्टिस त्रिवेदी ने कहा, ‘मैं उनके लिए (महिलाओं) सॉफ्ट कॉर्नर रखती हूं इसलिए नहीं कि मैं उन्हें कमजोर लिंग मानती हूं, बल्कि इसलिए कि मैं उनकी प्रतिबद्धता का सम्मान करती हूं. मैं उनकी आंतरिक शक्ति का सम्मान करती हूं. आप जानते हैं कि मैं कहा करती थी कि यदि आप अपने बाहरी प्रभुत्व से मुक्त होना चाहते हैं, तो आपको अपनी आंतरिक शक्ति की खोज करनी होगी.’

त्रिवेदी ने युवा महिला वकीलों से कहा कि कोई भी आपको रास्ता नहीं बताएगा और आपको अपना रास्ता खुद बनाना होगा. उन्होंने कहा, ‘खुद की रोशनी बनो.’

जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस त्रिवेदी के साथ शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के रूप में शपथ लेने वाली जस्टिस हिमा कोहली ने कहा कि वह उम्मीदों पर खरा उतरने और न्याय करने के लिए कानून के शासन का पालन करने की कोशिश करेंगी तथा इसे वह संवेदनशीलता प्रदान करेंगी जैसा कि महिलाएं होती हैं.

जस्टिस कोहली ने कहा, ‘मैं लिंग के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि निष्पक्ष दृष्टिकोण से बात कर रही हूं. मैं उस नजरिये के बारे में बात कर रही हूं, जो कभी-कभी पुरुष के साथ नहीं होता है. मैं यह नहीं कह रही हूं कि मेरे पुरुष सहयोगी संवेदनशील नहीं होते हैं. यह देखना आश्चर्यजनक है कि हमारे कई साथी जिनके साथ मैं बैठी हूं, वे महिला संबंधी मुद्दों को एक अलग दृष्टिकोण देंगे जो शायद मेरे सामने शायद नहीं आए.’

मालूम हो कि शीर्ष अदालत में तीन महिलाओं सहित नौ न्यायाधीशों ने एक साथ 31 अगस्त को शपथ ली थी. सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार एक साथ नौ न्यायाधीशों ने शपथ ली थी.

महिला वकीलों को न्यायपालिका में 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग उठानी पड़ेगी: सीजेआई

भारत के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने रविवार को महिला वकीलों का आह्वान किया कि वे न्यायपालिका में 50 प्रतिशत आरक्षण के लिए जोरदार तरीके से मांग उठाएं.

प्रधान न्यायाधीश ने इस मांग को अपना पूरा समर्थन जताते हुए कहा, ‘मैं नहीं चाहता कि आप रोएं, बल्कि आपको गुस्से के साथ चिल्लाना होगा और मांग करनी होगी कि हम 50 प्रतिशत आरक्षण चाहती हैं.’

उन्होंने कहा कि यह हजारों सालों के दमन का विषय है और महिलाओं को आरक्षण का अधिकार है. जस्टिस रमना ने कहा, ‘यह अधिकार का विषय है, दया का नहीं.’

उन्होंने कहा, ‘मैं देश के सभी विधि संस्थानों में महिलाओं के लिए एक निश्चित प्रतिशत आरक्षण की मांग की पुरजोर सिफारिश और समर्थन करता हूं ताकि वे न्यायपालिका में शामिल हो सकें.’

सुप्रीम कोर्ट की महिला अधिवक्ताओं द्वारा तीन महिला न्यायाधीशों समेत नवनियुक्त नौ न्यायाधीशों के सम्मान में आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘आप सब हंस रही हैं. मैं भी यही चाहता हूं कि आपको रोना नहीं पड़े, बल्कि आप गुस्से के साथ चिल्लाएं और मांग उठाएं कि हमें 50 प्रतिशत आरक्षण चाहिए.’

उन्होंने कहा, ‘यह छोटा मुद्दा नहीं है बल्कि हजारों सालों के दमन का विषय है. यह उचित समय है जब न्यायपालिका में महिलाओं का 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व होना चाहिए.’

उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य की बात है कि कुछ चीजें बहुत देरी से आकार लेती हैं और इस लक्ष्य की प्राप्ति होने पर उन्हें बहुत खुशी होगी.

जस्टिस रमना ने कहा कि लोग अक्सर बड़ी आसानी से कह देते हैं कि 50 प्रतिशत आरक्षण मुश्किल है, क्योंकि महिलाओं की अनेक समस्याएं होती हैं, लेकिन यह सही नहीं है.

कानूनी पेशे में प्रवेश करते समय महिलाओं को आने वाली कठिनाइयों के बारे में उन्होंने कहा, ‘मैं मानता हूं कि असहज माहौल है, बुनियादी सुविधाओं की कमी है, खचाखच भरे अदालत कक्ष हैं, प्रसाधन गृहों की कमी है, बैठने की जगह कम है. जो कुछ बड़े मुद्दे हैं.’

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, सीजेआई रमना ने कहा कि निचली न्यायपालिका में महिलाओं की संख्या केवल 30 प्रतिशत, उच्च न्यायालयों में 11.5 प्रतिशत और सर्वोच्च न्यायालय में 12 प्रतिशत है.

उन्होंने कहा कि भारत के 17 लाख अधिवक्ताओं में से केवल 15 प्रतिशत महिलाएं हैं, वे राज्य बार काउंसिल में निर्वाचित प्रतिनिधियों का केवल 2 प्रतिशत हैं और बार काउंसिल ऑफ इंडिया में कोई महिला सदस्य नहीं हैं.

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