भगत सिंह: वो चिंगारी जो ज्वाला बनकर देश के कोने-कोने में फैल गई थी…

 


अगस्त 1929 में जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर में हुई एक जनसभा में उस समय जेल में भूख हड़ताल कर रहे भगत सिंह और उनके साथियों के साहस का ज़िक्र करते हुए कहा कि ‘इन युवाओं की क़ुर्बानियों ने हिंदुस्तान के राजनीतिक जीवन में एक नई चेतना पैदा की है… इन बहादुर युवाओं के संघर्ष की अहमियत को समझना होगा.’वे सभी बहुत कमजोर हो चुके थे और बिस्तर पर पड़े थे. भगत सिंह ख़ूबसूरत व्यक्तित्व और बौद्धिक मिज़ाज वाले थे, बिल्कुल धीर-गंभीर और शांत. उनमें ग़ुस्से का लेशमात्र भी नहीं था. वे बड़ी विनम्रता से बातें कर रहे थे. जतिन दास तो और भी कोमल, शांत और विनम्र लगे. हालांकि तब वे गहरी पीड़ा में थे.’

ये जवाहरलाल नेहरू के शब्द हैं. जो उन्होंने अगस्त 1929 में लाहौर जेल में भूख हड़ताल कर रहे भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों से हुई अपनी पहली मुलाक़ात की याद करते हुए अपनी आत्मकथा में लिखे हैं.

इससे वर्ष भर पहले जुलाई 1928 में ‘किरती’ पत्रिका में भगत सिंह ने एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस के विचारों की तुलना की थी.इन दोनों राष्ट्रवादी नेताओं के बारे में भगत सिंह अपने उक्त लेख में लिखते हैं कि ‘यही दो नेता हिंदुस्तान में उभरते नज़र आ रहे हैं और युवाओं के आंदोलन में विशेष रूप से भाग ले रहे हैं. दोनों ही हिंदुस्तान की आज़ादी के कट्टर समर्थक हैं. दोनों ही समझदार और सच्चे देशभक्त हैं.’

सुभाष चंद्र बोस और नेहरू के विचारों की तुलना करते हुए भगत सिंह ने महाराष्ट्र और पंजाब में आयोजित विभिन्न राजनीतिक अधिवेशनों में दिए गए इन दोनों नेताओं के भाषणों और अन्य वक्तव्यों का विश्लेषण प्रस्तुत किया. इसी लेख के आख़िर में पंजाब के नौजवानों के सामने अपना निष्कर्ष रखते हुए भगत सिंह ने लिखा:

सुभाष आज दिल को कुछ भोजन देने के अलावा कोई दूसरी मानसिक ख़ुराक नहीं दे रहे हैं. आवश्यकता इस बात की है कि पंजाब के नौजवानों को इन युगांतकारी विचारों को खूब सोच-विचारकर पक्का कर लेना चाहिए. इस समय पंजाब को मानसिक भोजन की सख़्त ज़रूरत है और यह जवाहरलाल नेहरू से ही मिल सकता है. इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अंधे पैरोकार बन जाना चाहिए. लेकिन जहां तक विचारों का संबंध है, वहां तक इस समय पंजाबी नौजवानों को उनके साथ लगना चाहिए, ताकि वे इंक़लाब के वास्तविक अर्थ, हिंदुस्तान में इंक़लाब की ज़रूरत, दुनिया में इंक़लाब का स्थान क्या है, आदि के बारे में जान सकें.

नौजवान भारत सभा और पंजाब में गिरफ़्तारियों का दौर

साइमन कमीशन का विरोध करने के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में बुरी तरह घायल होने वाले राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय की नवंबर 1928 में मृत्यु के बाद भगत सिंह और उनके साथियों ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की हत्या करके लिया. दिसंबर 1928 में सांडर्स की हत्या के बाद पंजाब में अंग्रेज़ी राज का दमन-चक्र तेज़ी से चला.

पंजाब के निर्दोष नौजवानों को पुलिस द्वारा गिरफ़्तार कर बुरी तरह से प्रताड़ित किया जाने लगा. इन युवाओं में नौजवान भारत सभा के सदस्य भी शामिल थे, जिसकी स्थापना भगत सिंह और उनके साथियों ने की थी.

नौजवान भारत सभा के सदस्यों की गिरफ़्तारी का विरोध करते हुए जनवरी 1929 में दिए अपने एक बयान में जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि पंजाब में हो रही गिरफ़्तारियों को लेकर प्रेस में आ रही ख़बरें चिंताजनक हैं. जांच और खोजबीन के नाम पर पंजाब पुलिस द्वारा युवा कार्यकर्ताओं, ख़ासकर नौजवान भारत सभा के सदस्यों को प्रताड़ित किया जा रहा है.

नेहरू ने चुनौती भर स्वर में ‘द सर्चलाइट’ में छपे इस संदेश में कहा था:

जितना मैं नौजवान भारत सभा और उसके सदस्यों को जानता हूं, पुलिस चाहे कितना भी दमन या आतंक फैलाने की कोशिश कर ले, वह उन नौजवानों की ललक और देशभक्ति को डिगा नहीं सकती. वे बहादुर लोग हैं, जिन्हें अपने कार्यों के परिणाम का अंदाज़ा बख़ूबी है और वे उससे डरते नहीं.

उन्हें बाहर से हिम्मत या दिलासा की ज़रूरत नहीं, लेकिन वे नौजवान निश्चिंत रहें कि हिंदुस्तान के लोगों की संवेदना उनके साथ है और वे उनकी हरसंभव मदद करेंगे. मुझे भरोसा है कि नौजवान भारत सभा जीवंत बनी रहेगी और अधिक मज़बूत होकर भारतीय राष्ट्र के निर्माण में भागीदारी करेगी.

क्रांतिकारियों की भूख हड़ताल और न्याय का मखौल

जब जुलाई 1929 में जेल में बंद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अपने दूसरे साथियों के साथ राजनीतिक बंदियों के लिए बुनियादी सुविधाओं की मांग करते हुए भूख हड़ताल शुरू की. तब नेहरू ने भी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की इस हड़ताल का समर्थन किया था. नेहरू ने 5 जुलाई, 1929 को दिए अपने संदेश में, जो ‘द ट्रिब्यून’ में छपा था, कहा:

‘लगभग बीस दिनों से वे लोग किसी भी तरह का भोजन नहीं कर रहे और मुझे यह भी मालूम हुआ है कि उन्हें ज़बरदस्ती खिलाने की कोशिशें भी की जा रही हैं. इन दोनों नौजवानों ने भले ही ग़लत रास्ता चुना हो, मगर कोई भी हिंदुस्तानी उनके अप्रतिम साहस की सराहना करने से ख़ुद को रोक नहीं सकता. वे जिस कष्ट से गुजर रहे हैं, उससे हमारा हृदय व्यथित है. वे किसी निजी स्वार्थ के लिए बल्कि सभी राजनीतिक बंदियों की भलाई के लिए ये भूख हड़ताल कर रहे हैं. हम गहरी चिंता के साथ उनकी इस मुश्किल घड़ी पर निगाह रखे हुए हैं और हमें पूरी उम्मीद है कि हमारे ये बहादुर भाई इन मुश्किलों पर जीत ज़रूर हासिल करेंगे.’

भगत सिंह और उनके साथियों के जेल में ही नहीं अदालत में भी दुर्व्यवहार किया जा रहा था. अदालत में जज के सामने पुलिस द्वारा उन्हें मारा जा रहा था और इस तरह न्याय का खुला मज़ाक़ बनाया जा रहा था. भगत सिंह के साथियों पर हो रही ज़्यादती का ज़िक्र नेहरू ने ब्रिटिश राजनयिक रेजिनाल्ड ब्रिजमैन को 23 जुलाई 1929 को लिखे अपने ख़त में किया.

नेहरू ने लिखा था कि लाहौर षड्यंत्र मामले में अभियुक्तों को अदालत में भी हथकड़ी पहनाए रखी जा रही है, पुलिस के लोग उन्हें अदालत में खुलेआम मारते-पीटते हैं और यह सब देखते हुए जज (न्यायाधीश) मुंह फेर लेते हैं. नेहरू ने यह भी लिखा कि जब इस मामले की सुनवाई को उस मजिस्ट्रेट की अदालत से दूसरी अदालत में ले जाने की अपील डाली गई, तो उस अपील को भी ख़ारिज कर दिया गया.

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