महिलाओं के साथ भेदभाव ख़त्म करने के लिए समान नागरिक संहिता लाना ज़रूरी: एनएचआरसी अध्यक्ष

 


सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस अरुण मिश्रा ने एक समारोह में कहा कि संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता को लागू करके समानता की बात करता है, उसे अप्रभावी नहीं रहना चाहिए.नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वर्तमान अध्यक्ष अरुण मिश्रा ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 44, जिसमें ‘भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुरक्षित करने का प्रयास’ करने का एक संवैधानिक आदेश है, को अब अप्रभावी नहीं रहना चाहिए.

लाइव लॉ के मुताबिक, पूर्व न्यायाधीश ने कहा, ‘हम सामाजिक, प्रथागत और धार्मिक प्रथाओं के कारण दुनिया भर में महिलाओं के खिलाफ भेदभाव देखते हैं. विरासत, संपत्ति के अधिकार, माता-पिता के अधिकार, विवाहित महिला के अधिवास और कानूनी क्षमता में भेदभाव को दूर करने के लिए विधायी प्रावधानों को लागू करने का समय आ गया है.’

जस्टिस मिश्रा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा आयोजित मानवाधिकार दिवस समारोह में स्वागत भाषण दे रहे थे. इस अवसर पर मुख्य अतिथि के बतौर भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी उपस्थित थीं.सामाजिक प्रगति सुनिश्चित करने के लिए महिलाओं को सशक्त बनाने की आवश्यकता के बारे में बोलते हुए जस्टिस मिश्रा ने कहा, ‘कमजोर वर्गों और ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए समानता सुनिश्चित करने की जरूरत है. विकास और उचित शिक्षा के माध्यम से महिलाओं का सशक्तिकरण आवश्यक है. उन्हें अनंत काल के लिए भेदभाव और लैंगिक हिंसा का कष्ट नहीं भोगने दे सकते.’

उन्होंने कहा, उन्हें (महिलाओं को) गरिमा और समान अधिकार प्रदान किए बिना मानवाधिकार दिवस का जश्न ‘अर्थहीन’ है. साथ ही, उन्होंने जोड़ा कि समान नागरिक संहिता को लागू करने का समय आ गया है.

उन्होंने जोर देकर कहा, ‘संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता को लागू करके समानता की बात करता है, उसे अप्रभावी नहीं रहना चाहिए.’

वर्ष के लिए संयुक्त राष्ट्र के नारे की थीम ‘सभी के लिए गरिमा, स्वतंत्रता और न्याय’ को ऋग्वेद के एक श्लोक से जोड़ते हुए उन्होंने मानव विकास में सभी को साथ लेकर चलने की बात कही.

उन्होंने हिंदू दर्शन के मूल सिद्धांतों में से एक ‘बहुजन सुखाय बहुजन हितय’ का आह्वान किया, जिसका अर्थ है कि जनता की खुशी में लोक कल्याण निहित है.

उन्होंने यह भी बताया कि पिछले साल मानवाधिकार आयोग को 1.21 लाख शिकायतें मिली थीं और उसने 1.28 लाख मामलों का फैसला किया, जिनमें बीते वर्षों के मामले भी शामिल थे. उनके अनुसार, आयोग ने 356 मामलों में 11.69 करोड़ रुपये के मुआवजे की भी सिफारिश की.

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