अडानी-हिंडनबर्ग केस: सुप्रीम कोर्ट का मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक लगाने से इनकार

 


सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में सेबी और केंद्रीय गृह मंत्रालय को हिंडनबर्ग, इसके शोधकर्ता नाथन एंडरसन और अन्य के ख़िलाफ़ जांच करने और प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश देने की मांग की थी. साथ ही, कहा गया था कि सूचीबद्ध कंपनियों से संबंधित मीडिया रिपोर्ट्स को रोकने के लिए एक गैग ऑर्डर लाया जाए.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यह स्पष्ट कर दिया कि हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट, जिसमें अडानी समूह पर स्टॉक हेरफेर और लेखा धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया है, को लेकर वह मीडिया के खिलाफ कोई निषेधाज्ञा आदेश पारित नहीं करेगा.

रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रतिक्रिया वकील एमएल शर्मा की एक याचिका पर आई है. शर्मा, जो इस मामले में याचिकाकर्ताओं में से एक हैं, ने बाजार नियामक सेबी और केंद्रीय गृह मंत्रालय को हिंडनबर्ग, इसके शोधकर्ता नाथन एंडरसन और अन्य के खिलाफ जांच करने और प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश देने की मांग की थी.बार एंड बेंच के मुताबिक, शर्मा ने सूचीबद्ध कंपनियों से संबंधित मीडिया रिपोर्ट्स को रोकने के लिए एक गैग ऑर्डर (gag order) की भी मांग थी, जब तक कि इस तरह की रिपोर्ट्स पहले सेबी पास दायर और सत्यापित नहीं की जाती हैं.

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, ‘हम कभी भी मीडिया को कोई निषेधाज्ञा जारी नहीं करने जा रहे हैं. हम जल्द ही आदेश सुनाएंगे.’

पीठ में जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जेबी पारदीवाला भी शामिल थे.

बता दें कि बीते 17 फरवरी को केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नामों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह अडानी-हिंडनबर्ग मामलों को ध्यान में रखते हुए नियामक तंत्र की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन करेगा.

मालूम हो कि अमेरिकी निवेश अनुसंधान फर्म हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी समूह पर धोखाधड़ी के आरोप लगाए थे, जिसके बाद समूह की कंपनियों के शेयरों में पिछले कुछ दिन में भारी गिरावट आई है. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि दो साल की जांच में पता चला है कि अडानी समूह दशकों से ‘स्टॉक हेरफेर और लेखा धोखाधड़ी’ में शामिल रहा है.

रिपोर्ट सामने आने के बाद अडानी समूह ने बीते 26 जनवरी को कहा था कि वह अपनी प्रमुख कंपनी के शेयर बिक्री को नुकसान पहुंचाने के प्रयास के तहत ‘बिना सोचे-विचारे’ काम करने के लिए हिंडनबर्ग रिसर्च के खिलाफ ‘दंडात्मक कार्रवाई’ को लेकर कानूनी विकल्पों पर गौर कर रहा है.

इसके जवाब में हिंडनबर्ग रिसर्च ने कहा था कि वह अपनी रिपोर्ट पर पूरी तरह कायम है. कंपनी ने यह भी कहा था कि अगर अडानी समूह गंभीर है, तो उसे अमेरिका में भी मुकदमा दायर करना चाहिए, जहां हम काम करते हैं. हमारे पास कानूनी प्रक्रिया के दौरान मांगे जाने वाले दस्तावेजों की एक लंबी सूची है.

इसके बाद बीते 30 जनवरी को अडानी समूह ने हिंडनबर्ग रिसर्च के आरोपों के जवाब में 413 पृष्ठ का ‘स्पष्टीकरण’ जारी किया था. अडानी समूह ने इन आरोपों के जवाब में कहा था कि यह हिंडनबर्ग द्वारा भारत पर सोच-समझकर किया गया हमला है. समूह ने कहा था कि ये आरोप और कुछ नहीं सिर्फ ‘झूठ’ हैं.

समूह ने कहा था, ‘यह केवल किसी विशिष्ट कंपनी पर एक अवांछित हमला नहीं है, बल्कि भारत, भारतीय संस्थाओं की स्वतंत्रता, अखंडता और गुणवत्ता, तथा भारत की विकास गाथा और महत्वाकांक्षाओं पर एक सुनियोजित हमला है.’

अडानी समूह के इस जवाब पर पलटवार करते हुए हिंडनबर्ग समूह की ओर से बीते 31 जनवरी को कहा गया था कि धोखाधड़ी को ‘राष्ट्रवाद’ या ‘कुछ बढ़ा-चढ़ाकर प्रतिक्रिया’ से ढका नहीं जा सकता. भारत एक जीवंत लोकतंत्र और उभरती महाशक्ति है. अडानी समूह ‘व्यवस्थित लूट’ से भारत के भविष्य को रोक रहा है.

हिंडनबर्ग की ओर से कहा गया था, ‘हम असहमत हैं. स्पष्ट होने के लिए हम मानते हैं कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है और एक रोमांचक भविष्य के साथ एक उभरती हुई महाशक्ति है. हम यह भी मानते हैं कि भारत का भविष्य अडानी समूह द्वारा रोका जा रहा है, जिसने देश को व्यवस्थित रूप से लूटते हुए खुद को राष्ट्रवाद के आवरण में लपेट लिया है.’

हिंडनबर्ग रिसर्च ने प्रतिक्रिया में कहा कि धोखाधड़ी, धोखाधड़ी ही होती है चाहे इसे दुनिया के सबसे अमीर आदमी ने अंजाम क्यों न दिया हो.

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