यूपी: राहुल अमेठी से लोकसभा का चुनाव लड़ें तो… और न लड़ें तो?

 


चुनाव हमेशा पुराने आंकड़ों व समीकरणों के बूते नहीं जीते जाते, कई बार उन्हें परसेप्शन और मनोबल की बिना पर भी जीता जाता है. राहुल गांधी अमेठी व प्रियंका गांधी वाराणसी से चुनाव मैदान में उतर जाएं तो अनुकूल परसेप्शन बनाने के भाजपा, नरेंद्र मोदी के महारत का वही हाल हो जाएगा, जो पिछले दिनों विपक्षी गठबंधन का ‘इंडिया’ नाम रखने से हुआ था.सर्वाधिक लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश (यूपी) में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के पास खोने के लिए अब लोकसभा की एक और विधानसभा की दो सीटें ही बची हैं, लेकिन पाने के लिए? जवाब कई विडंबनाओं से होकर गुजरता है. फिलहाल, 1989 में प्रदेश की सत्ता से बाहर होने के बाद लगातार हाशिये में जाती-जाती कांग्रेस न तीन में रह गई है, न तेरह में. यह न उसे छोड़ गए मतदाताओं को फिर से विश्वास में ले पा रही है, न अपने प्रति दूसरी पार्टियों का मन ही ‘साफ’ कर पा रही है- सत्तारूढ़ भाजपा का मन साफ कर पाने का तो खैर सवाल ही नहीं है, लेकिन प्रमुख विपक्षी दलों-सपा व बसपा-के मन भी उसके प्रति साफ नहीं ही हैं. भले ही वह अलग-अलग वक्तों पर इन दोनों से गठबंधन कर चुकी है. स्वाभाविक ही इस प्रदेश में विपक्षी एकता में भी उसकी कोई भूमिका नहीं है.

अलबत्ता, इस दुर्दिन में भी वह कभी सोती तो कभी जागती आंखों से अपने पुनर्जीवन के सपने देखती रही है, क्योंकि उसे पता है कि दिल्ली का रास्ता अभी भी यूपी से होकर ही गुजरता है. फिर भी वह अभी तक इन सपनों को साकार करने की कुछ मौसमी कवायदों से (जो गत वर्ष के प्रदेश विधानसभा के चुनाव तक जारी रहकर औधे मुंह गिर चुकी हैं) आगे नहीं बढ़ पाई है. और तो और, 2024 के लोकसभा चुनाव के लगभग सिर पर आ जाने के बावजूद वह ‘एक कदम आगे, दो कदम पीछे’ जैसे कदमताल में ही फंसी हुई है और खुद को किसी निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार नहीं कर पा रही.

उसके इस ‘आगे-पीछे’ की एक मिसाल पिछले दिनों तब बनी जब उसने अपने दलित प्रदेश अध्यक्ष बृजलाल खाबरी को दस महीनों में ही हटा दिया और उनकी जगह कमान अगड़े अजय राय को दे दी. भाजपा व सपा के रास्ते कांग्रेस में आए जुझारू अजय राय कभी वाराणसी की कोलअसला विधानसभा सीट से कम्युनिस्ट नेता ऊदल तो वाराणसी लोकसभा सीट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती दे चुके हैं. प्रदेश अध्यक्ष बनते ही जानें किस रौ में उन्होंने ऐलान कर दिया कि 2019 में अमेठी लोकसभा सीट हार चुके पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी फिर उसी सीट से चुनाव लड़ेंगे.

लेकिन जैसे ही इस ऐलान पर प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हुईं, उन्होंने यह कहकर उसे संशोधित कर दिया कि दरअसल, वे पार्टी कार्यकर्ताओं की इस चाह को अभिव्यक्त कर रहे थे कि राहुल अमेठी से लडे़ं- इस तथ्य के बावजूद कि उनके ऐलान पर आई ज्यादातर प्रतिक्रियाएं सकारात्मक थीं. यह उम्मीद जताने वाली कि ‘भारत जोड़ो’ यात्रा के दौरान सामने आया राहुल का नया अवतार उनके अमेठी से चुनाव लड़ने पर पार्टी के पुनर्जीवन में सहायक हो सकता है. उनकी व अजय राय की अगुवाई में वह भाजपा के सवर्ण व समाजवादी पार्टी के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा ले तो प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों व संभावनाओं को बदल सकती है.

अजय राय के जवाब में अमेठी से ही लड़ने की स्मृति ईरानी (राहुल की परंपरागत प्रतिद्वंद्वी) की घोषणा के बाद वहां से लौटे एक स्वतंत्र पत्रकार की मानें, तो वहां लोग स्मृति ईरानी से इतने नाराज हैं कि राहुल जाकर पर्चा भर दें और प्रचार में न उतरें, तो भी जीत जाएंगे. इसी तरह रायबरेली लोकसभा सीट पर कांग्रेस का कब्जा बरकरार रखने के लिए भी प्रियंका (गौर कीजिए, सोनिया नहीं) का पर्चा भर आना ही काफी होगा. अमेठी व रायबरेली में ये भाई-बहन मजबूती से चुनाव लड़ेंगे तो आस-पास की कोई आधा दर्जन सीटों के नतीजों पर भी उसका असर होगा. इस पत्रकार का सुझाव है कि राहुल को अमेठी व वायनाड (केरल), जहां से वे सांसद हैं, दोनों सीटों से चुनाव लड़ना और घोषित कर देना चाहिए कि जिस सीट से वे ज्यादा बड़े अंतर से जीतेंगे, उसे ही अपने पास रखेंगे.

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