उत्तर प्रदेश: क्या देवरिया उपचुनाव भाजपा के लिए साख का सवाल बन गया है


उत्तर प्रदेश की देवरिया विधानसभा सीट पर 3 नवंबर को होने वाला उपचुनाव राज्य में ब्राह्मण राजनीति को टेस्ट करने का पैमाना बन गया है. जिस दल को जीत मिलेगी, वह अपने साथ ब्राह्मणों के होने का दावा करेगा.


देवरिया: उत्तर प्रदेश (यूपी) की सात विधानसभा सीटों पर हो रहे उपचुनाव में देवरिया का चुनाव सबसे दिलचस्प है. यहां का उपचुनाव यूपी में ब्राह्मण राजनीति को टेस्ट करने का बैरोमीटर बन गया है. जिस दल को जीत मिलेगी, वह अपने साथ ब्राह्मणों के होने का दावा करेगा.


इस सीट पर सभी चार प्रमुख दलों- भाजपा, सपा, कांग्रेस व बसपा ने ब्राह्मण प्रत्याशी उतारे हैं. यहां पर भाजपा विधायक जनमेजय सिंह के निधन के कारण उपचुनाव हो रहा है.


उनके बेटे अजय प्रताप सिंह उर्फ पिंटू सिंह भाजपा से टिकट के स्वभाविक दावेदार थे लेकिन भाजपा के उनके बजाय डॉ. सत्य प्रकाश मणि त्रिपाठी को टिकट दे दिया. इससे नाराज होकर वे चुनाव मैदान में कूद पड़े हैं.


उनका कहना है कि वे अपने पिता के सम्मान के लिए चुनाव लड़ रहे हैं. ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) बाबू सिंह कुशवाहा की पार्टी सहित आठ दलों के भागीदारी संकल्प मोर्चा द्वारा अजय प्रताप सिंह को समर्थन दिए जाने से यहां का चुनाव पंचकोणीय हो गया है.


दोनों नेताओं ने कई दिन देवरिया में रहकर पिंटू सिंह के लिए प्रचार किया. देवरिया विधानसभा उपचुनाव के लिए तीन नवंबर को मतदान होगा. यहां पर कुल 14 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे है.


इस उपचुनाव में भाजपा का गणित सपा ने अपने कद्दावर नेता पूर्व मंत्री ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को चुनाव में उतारकर बिगाड़ दिया.


देवरिया विधानसभा क्षेत्र ब्राह्मण, सैंथवार सहित पिछड़ी जातियों की संख्या अच्छी-खासी है. साथ ही देवरिया शहर में वैश्य, कायस्थ व अन्य जातियों के लोग हैं.


उपचुनाव की घोषणा के बाद सबसे पहले बसपा ने अभय नाथ त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाया. त्रिपाठी वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव भी बसपा से ही लड़े थे और तीसरे स्थान पर रहे थे.


बसपा के बाद कांग्रेस ने यहां से मुकुंद भास्कर मणि त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाया. सपा और भाजपा से कई नामों की चर्चा थी. कुछ नाम तो ऐसे थे कि जो दोनों पार्टियों से लिए जा रहे थे.


लेकिन सपा ने नामांकन के कुछ दिन पहले ही पार्टी के कद्दावर नेता एवं पूर्व मंत्री ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को यहां से उम्मीदवार घोषित कर दिया.


त्रिपाठी का क्षेत्र कुशीनगर है और वे वहीं से चुनाव लड़ते रहे. वर्ष 2017 का चुनाव वे भाजपा से हार गए थे. त्रिपाठी का प्रभाव कुशीनगर और देवरिया दोनों जिलों में है, विशेषकर ब्राह्मणों में.


ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को सपा हाईकमान से अचानक ही चुनाव लड़ने की हरी झंडी मिली. त्रिपाठी ने नामांकन के कुछ दिन पहले समर्थकों से अपने चुनाव लड़ने की स्थिति पर चर्चा की थी.


इसके पहले यहां पर पिछली बार सपा से चुनाव लड़कर दूसरे स्थान पर रहे जेपी जायसवाल के चुनाव लड़ने की चर्चा थी. ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को टिकट मिलने के पहले जेपी जायसवाल का एक ऑडियो भी वायरल हुआ था, जिसमें वे त्रिपाठी को टिकट मिलने की चर्चा पर नाराजगी जता रहे हैं.


जायसवाल खुले रूप से सपा प्रत्याशी का विरोध नहीं कर रहे हैं. उन्होंने एक स्थानीय अखबार में विज्ञापन देकर सपा प्रत्याशी के समर्थन में विधानसभा क्षेत्र के भ्रमण का कार्यक्रम प्रकाशित कराया था, लेकिन रोचक बात यह थी कि इस विज्ञापन में न तो सपा प्रत्याशी का नाम था न उनकी तस्वीर.


ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को सपा द्वारा चुनाव मैदान में उतार देने से भाजपा खेमे में घबराहट पैदा हो गई और वे प्रत्याशी चयन को लेकर दबाव में आ गए.


पहले से ब्राह्मणों की योगी सरकार से नाराजगी की चर्चा से परेशान भाजपा नेतृत्व को कुछ नहीं सूझा. भाजपा से टिकट के दावेदारों में दिवंगत भाजपा विधायक जनमेजय सिंह के पुत्र अजय प्रताप सिंह के अलावा पूर्व विधायक प्रमोद सिंह, भाजपा नेता रतन पाल सिंह, डॉ. सत्य प्रकाश मणि त्रिपाठी, रवींद्र प्रताप मल्ल आदि के नाम चर्चा में थे.


भाजपा ने यहां से राजपूत प्रत्याशी देने का रिस्क नहीं लिया और उसने डॉ. सत्य प्रकाश मणि त्रिपाठी को उम्मीदवार बना दिया. विकास दुबे कांड से लेकर कई घटनाओं के बाद भाजपा ब्राह्मणों को किसी भी हाल में नाराज नहीं करना चाहती है.


विपक्षी दल लगातार इस मुद्दे पर हमलावर हैं और कोशिश कर रहे हैं कि ब्राह्मणों को अपनी ओर किया जाय. सपा और कांग्रेस इस दिशा में विशेष रूप से प्रयास कर रहे हैं .


देवरिया विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव इस रस्साकशी का क्षेत्र बना है. भाजपा यहां जीतकर यह साबित करना चाहती है कि ब्राह्मण उसके साथ हैं और ब्राह्मणों के नाराज होने की बात विपक्षी दलों आरोप के अलावा और कुछ नहीं है.


सपा, कांग्रेस और बसपा भी अपना पूरा जोर लगाए हुए है. इन दलों को यह साबित करना है कि उनके साथ ब्राह्मण मतदाता हैं. कांग्रेस पहली बार कोई चुनाव योजनाबद्ध ढंग से लड़ रही है.


कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव सचिन नाइक, प्रदेश महामंत्री विश्वविजय सिंह सहित कई वरिष्ठ नेता एक पखवाड़े से यहां कैंप किए हुए हैं. कोशिश यह दिखाने की है कि कांग्रेस मजबूती से चुनाव लड़ी है, परिणाम भले ही कुछ हो.


देवरिया पार्टी संगठन के सभी कार्यकर्ताओं-नेताओं को तो लगाया ही गया है, आस-पास के जिलों से भी कार्यकर्ताओं को बुलाकर प्रचार में लगाया गया है.


कांग्रेस कार्यकर्ता घर-घर जनसंपर्क कर मतदाताओं को कांग्रेस पार्टी के नए तेवर से परिचित कराने में जुटे हैं.


वहीं, सपा ने देवरिया के अलावा गोरखपुर, महराजगंज, कुशीनगर के सभी नेताओं को चुनाव प्रचार में लगा दिया है. सभी नेता गांव-गांव घूम-घूमकर प्रचार कर रहे हैं.


सपा प्रत्याशी ब्रह्माशकर त्रिपाठी का अपना खुद का व्यापक नेटवर्क है, इसलिए उन्होंने कम दिनों में ही अपने प्रचार अभियान के बहुत सुव्यवस्थित कर दिया.


भाजपा इस सीट को किसी भी हालत में जीतना चाहती हैं. पार्टी ने एक दर्जन मंत्रियों को प्रचार में लगा दिया है. कैबिनेट मंत्री सूर्य प्रताप शाही, जय प्रकाश निषाद, डॉ. सतीश द्विवेदी, आनंद स्वरूप शुक्ल आदि मंत्री दिन-रात प्रचार में जुटे रहे. खुद योगी आदित्यनाथ ने 31 अक्टूबर को देवरिया में सभा की.


इसके पहले केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार, उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा, केशव प्रसाद मौर्य, निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने सभाएं की.


विपक्षी दलों का आरोप है कि योगी सरकार सरकारी मशीनरी का व्यापक दुरूपयोग कर रही है. ग्राम प्रधानों को भाजपा के पक्ष में मतदान कराने का दबाव बनाया जा रहा है.


वर्ष 2011 में परिसीमन के बाद गौरी बाजार विधानसभा क्षेत्र का आधा हिस्सा देवरिया विधानसभा क्षेत्र में जोड़ दिया गया. बाकी हिस्सा पथरदेवा और रामपुर कारखाना विधानसभा क्षेत्र में जोड़ा गया.


गौरी बाजार विधानसभा क्षेत्र में इसके पहले हुआ उपचुनाव भाजपा हार चुकी है. इस क्षेत्र में वर्ष 2000 में उपचुनाव हुआ था. भाजपा विधायक श्रीनिवास मणि त्रिपाठी के निधन के कारण हुए उपचुनाव में भाजपा ने उनकी पत्नी जाह्नवी मणि त्रिपाठी को चुनाव मैदान में उतारा था लेकिन वह बसपा प्रत्याशी जनमेजय सिंह से सिर्फ 29 मतों से हार गईं.


जनमेजय सिंह इसके बाद का चुनाव हारे. वह 2005 में भाजपा में शामिल हो गए और वर्ष 2007 का चुनाव भाजपा से लड़े लेकिन वह फिर बसपा प्रत्याशी प्रमोद सिंह सिंह से हार गए. इसके बाद के दो चुनाव वह लगातार जीते.


दो दशक बाद यहां फिर उपचुनाव हो रहा है. इस बार इतिहास अपने को भिन्न तरीके से दोहरा रहा है, अब देखना है कि क्या इसका नतीजा भी वैसा ही निकलता है.


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