अयोध्या में विराजने को तैयार रामलला, जानें इस संघर्ष में कब क्या-क्या हुआ

 


इस आयोजन को भव्य बनाने के लिए तमाम तरह की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है. इस दिन को यादगार बनाने के लिए अयोध्या के हर हिस्से को सजाया जा रहा है.





नई दिल्ली: 

उत्तर प्रदेश के अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा (Ram Mandir) को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं. 22 जनवरी को होने वाले इस आयोजन में पीएम नरेंद्र मोदी समेत कई बड़ी हस्तियां के शामिल होने की बात सामने आ रही है. इस आयोजन मे शामिल होने के लिए कई बड़ी हस्तियों को भी न्योता भेजा गया है. 

इस आयोजन को भव्य बनाने के लिए तमाम तरह की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है. इस दिन को यादगार बनाने के लिए अयोध्या के हर हिस्से को सजाया जा रहा है. शहर की मुख्य सड़क को सूर्य-थीम वाले स्तंभों से सजाया जा रहा है. यहां पर 30 फुट ऊंचे प्रत्येक स्तंभ में एक खूबसूरत गोलाकार आकृति बनी है, जो रात में लाइट जलने पर सूर्य की तरह चमकने लगता है. 

इन तमाम तैयारियों के बीच आज हम आपको ये बताने जा रहे हैं कि आखिर राम मंदिर के लिए कितने वर्षों तक संघर्ष किया गया. और किस साल क्या कुछ हुआ. इस संघर्ष की शुरुआत होती है वर्ष 1885 में...वर्ष 1885 : इसी साल महंत रघुबर दास ने अदालत से मांग की कि चबूतरे पर मंदिर बनाने की इजाजत दी जाए. यह मांग खारिज हो गई.

वर्ष 1946 : विवाद उठा कि बाबरी मस्जिद शियाओं की है या सुन्नीयों की. फैसला हुआ कि बाबर सुन्नी की था इसलिए सुन्नीयों की मस्जिद है.

वर्ष 1949 : जुलाई में प्रदेश सरकार ने मस्जिद के बाहर राम चबूतरे पर राम मंदिर बनाने की कवायद शुरू की. लेकिन यह भी नाकाम रही. 22-23 दिसंबर को मस्जिद में राम सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दी गईं.29 दिसंबर को यह संपत्ति कुर्क कर ली और वहां रिसीवर बिठा दिया गया.

वर्ष 1950 : इसी साल से इस जमीन के लिए अदालती लड़ाई का एक नया दौर शुरू  होता है. इस तारीखी मुकदमे में जमीन के सारे दावेदार 1950 के बाद के हैं.16 जनवरी को गोपाल दास विशारत अदालत गए. कहा कि मूर्तियां वहां से न हटें और पूजा बेरोकटोक हो. अदालत ने कहा कि मूर्तियां नहीं हटेंगी, लेकिन ताला बंद रहेगा और पूजा सिर्फ पुजारी करेगा. जनता बाहर से दर्शन करेगी.

वर्ष 1959: निर्मोही अखाड़ा अदालत पहुंचा और वहां अपना दावा पेश किया.

वर्ष 1961: सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड अदालत पहुंचा. मस्जिद का दावा पेश किया.

वर्ष 1986: 1 फरवरी को फैजाबाद के जिला जज ने जन्मभूमि का ताला खुलवा के पूजा की इजाजत दे दी.

वर्ष 1986 : कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनाने का फैसला हुआ.

वर्ष 1989: वीएचपी नेता देवकीनंदन अग्रवाल ने रामलला की तरफ से मंदिर के दावे का मुकदमा किया. नवंबर में मस्जिद से थोड़ी दूर पर राम मंदिर का शिलान्यास किया गया.

वर्ष 1990 : बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से एक रथ यात्रा शुरू की. इस यात्रा को अयोध्या तक जाना था. इस रथयात्रा से पूरे मुल्क में एक जुनून पैदा किया गया. इसके नतीजे में गुजरात, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में दंगे भड़क गए. ढेरों इलाके कर्फ्यू की चपेट में आ गए. लेकिन आडवाणी को 23 अक्टूबर को बिहार में लालू यादव ने गिरफ्तार करवा लिया.

वर्ष 1990 : कारसेवक मस्जिद के गुम्बद पर चढ़ गए और गुम्बद तोड़ा. वहां भगवा फहराया. इसके बाद दंगे भड़क गए.  

वर्ष 1991 : जून में आम, चुनाव हुए और यूपी में  बीजेपी की सरकार बन गई.

वर्ष 1992 : 30-31 अक्टूबर को धर्म संसद में कारसेवा की घोषणा हुई.

वर्ष 1992 : नवंबर में कल्याण सिंह ने अदालत में मस्जिद की हिफाजत करने का हलफनामा दिया. लेकिन 6 दिसंबर 1992 को लाखों कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी. कारसेवक 11 बजकर 50 मिनट पर मस्जिद के गुम्बद पर चढ़े. करीब 4.30 बजे मस्जिद का तीसरा गुम्बद भी गिर गया. इस घटना के बाद मुख्यमंत्री कल्याण सिंह जिन्होंने अदालत में हलफानामा देकर मस्जिद की हिफाजत की जिम्मेदारी ली थी, अपनी बाद से पलट गए थे. उन्होंने इस पर फख्र जताया था. 

उन्होंने कहा था, अधिकारियों का कर्मचारियों का किसी रूप में कहीं कोई दोष नहीं. कसूर नहीं, सारी जिम्मेदारी मैं अपने ऊपर लेता हूं. इस्तीफा देता हूं. किसी कोर्ट में कोई केस चलना है तो मेरे खिलाफ करो. किसी कमीशन में कोई इन्क्वायरी होनी है तो मेरे खिलाफ करो.

वर्ष 2003: हाईकोर्ट ने 2003 में झगड़े वाली जगह पर खुदाई करवाई ताकि पता चल सके कि क्या वहां पर कोई राम मंदिर था.

वर्ष 2005 : यहां आतंकवादी हमला हुआ. लेकिन आतंकवादी वहां कुछ नुकसान नहीं कर सके और मारे गए.

वर्ष 2010 :  इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने आदेश पारित कर अयोध्या में विवादित जमीन को राम लला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड में बराबर बांटने का फैसला किया जिसे सबने सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया है.

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वर्ष 2011: हिंदू और मुस्लिम समूहों द्वारा 2010 के फैसले के खिलाफ अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया.

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